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धरोहर-1

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अगर आप इंटरनेट पर दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी सर्च करोगे तो गूगल आपको बोलोना यूनिवर्सिटी को पेश कर देगा जो की आधुनिक अर्थों में विश्व का सबसे पुराना शिक्षण संस्थान है।  लेकिन भारत के समृद्ध इतिहास से अनगिनत धरोहरों को विदेशी और ख़ासकर मुस्लिम आक्रांताओ द्वारा मिटा दिया गया। वजह उनकी ताकत नहीं थी बल्कि हमारे ख़ुद की जागरण की कमी और जयचंदों ने राष्ट्र पर कुठाराघात किया है।  आज हम आपसे बात करेंगे तक्षशिला विश्वविद्यालय की जहां पर शिक्षा की मशाल एक संस्थान के रूप में पहली बार संभाली गई। बात उस समय की है जब गुरुकुल और मठों से शिक्षा का विस्तार हो रहा था। कहते हैं कि भरत के सुपुत्र तक्ष ने तक्षशिला नगरी को बसाया था।  इसी महान नगरी में 600-700 ईसा पूर्व स्थापित किया गया था एक विश्वविद्यालय जिसे इसी नगरी का नाम दिया गया- तक्षशिला। यह एक सीमाओं से रहित एक विस्तृत क्षेत्र था जहां पर महान शिक्षाविद अपने आश्रम बनाते थे जो की सभी के लिए बिना भेदभाव के लिए खुले रहते थे बशर्ते विद्यार्थी गहन अध्ययन के लिए तत्पर हों। यहां के शिक्षक या आचार्य शिक्षा के मर्म को...

भंवर में कश्ती

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रास्ते बहुत नापे हैं मगर मंज़िल अनजानी-सी है लफ़ाजी मुहब्बत की दरिया में क़श्ती अपनी बेगानी-सी है तुफ़ान से बेख़ौफ नाचती  पर सहमी-सी भंवर से क्यों है ? डूब जायेगी या तर जायेगी मुद्दतों की यही कहानी-सी है  चप्पु उल्टे पडें या सीधे इतना हिसाब कहां है अभी बेहोशी में सफर तय करना ऐसी आदत कुछ पुरानी-सी है लाश तो ठिकाने लग जानी है कुछ संभलता हूं जाग कर कहीं तड़फता है कचोटता है चित्त भटकती मधुमक्खी दिवानी-सी है बार-बार सुनाई कहानी-सी है।                              -रामफल

जलसमाधि

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मेरी भी एक कहानी है आ बैठ ! तुम्हें सुनानी है  दिल थाम कर बैठ जा  माँ के आंख का पानी है।  गर्भ में मैं आया था  प्यास ने तड़फाया था माँ भटकी पानी की तलाश में  चली गयी दरिंदो के पाश में।  भूख भी लगी थी  तभी गयी ठगी थी  दिखता अनानास भीतर विस्फोट था जाहिलों के भीतर छिपा खोट था।   बारूद फट गया  जिंदगी से नाता कट गया  बेजुबान मुँह गला लहूलुहान था   इंसान की बाहुदरी का बखान था।   माँ ने किसी को नहीं मारा  उसने तो खुदा को पुकारा  तेरे इंसान ने ज़कात में क्या दिया !   मेरी मौत का तमाशा बना दिया।   माँ रोती रही  बेसुध होती रही  मैं भी भीतर तड़फता रहा  माँ की मासूमियत से लड़ता रहा।  वेलियार की शरण पा कर   आग सीने की बुझा कर मुझसे मांगते ही बेवज़ह माफ़ी  इंसानियत और माँ ने ले ली जलसमाधि।                      

अब बता जिएं तो कैसे जिएं !

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तू बीच अधर में छोड़ गयी सुना फैसला कलम तोड़ गयी प्रिये !  सांस सांस तेरी याद में  लेना मुश्किल हो रहा है  उम्र के इस पड़ाव पर  आंसू छलकाना मुश्किल हो रहा है  अधपका प्रेमफल तोड़ गयी   तू बीच अधर में छोड़ गयी, प्रिये ! अब बता जिएं तो कैसे जिएं ! तेरे साथ की  कश्ती में  जवानी का भंवर गुजर गया  शांत किनारे पर बैठने की आश में  सफर अच्छा गुजर गया !  अब तो निर्मोह प्यास थी  खिलते कमल की सुवास थी  प्रिये प्रेममहल पल में उजड़ गया  तू जबसे मुख मोड़ गयी   जीवन कलश तोड़ गयी    तू बीच अधर में छोड़ गयी, प्रिये   अब बता जिएं तो कैसे जिएं ! मेरी वेदना किसे सुनाऊं  'सुनो भी' कहकर किसे बुलाऊं  किसी सूरत में तेरी मूरत पाऊं  फुदकती चिड़िया को कैसे समझाऊं !  उच्छृंखल हुआ तो जग उलाहना देगा  सफ़ेद दाढ़ी की दुहाई देगा  पहन बेड़ियां तेरी तलाश कर रहा हूं  लाश हूं पर सांस भर रहा हूं    तू जीवन डोर क्यों तोड़ गयी प्रिये तू बीच अधर में छोड़ गयी, प्रिये ...

विद्या की रेखा

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विद्या की रेखा  आज मैं एक अद्भुत कहानी लेकर आया हूँ जो की आपको भीतर से झकझोर देगी।  ये कहानी हमारे संस्कृत के टीचर ने दसवीं क्लास में सुनाई थी, हुआ ये था की पढ़ते हुए किसी श्लोक पर भाग्य के बारे में स्टूडेंट्स की डिस्कशन डिबेट में बदल गयी थी। श्री महावीर जी संस्कृत के जाने माने टीचर थे, उन्होंने हमारी डिबेट को बीच में रोककर बोलना शुरू किया, "किसी के लिए भाग्य मायने रख सकता है पर कुछ इसे बना लेते हैं।" हमने एक साथ पूछा, "कैसे सरजी ?" "एक बालक था नाम था पाणिनि।  पढ़ने में इतना कमजोर की हर टीचर से डांट पड़ती पर कुछ भी सुधार न होता था, टीचर्स ने पीट कर भी जोर लगा लिया मगर उसे कुछ याद न होता।" श्रीमान जी बड़ी शिद्दत से कहानी सुनाने लगे थे। टीचर्स ने तंग होकर उसे गुरुकल से जाने को कह दिया था उसे। घर आकर अपने पिताश्री पाणिन जी को सब बताया तो वो बड़े दु:खी हुए क्योंकि पाणिन जी खुद भी एक विख्यात विद्वान् पंडित थे।  एक मंदबुद्धि बेटे को पाकर वो भीतर ही भीतर घुट रहे थे।  कुछ दिन बाद पाणिन जी के पास उनके बचपन के मित्र का आना हुआ जिनका ज्योतिष और शास्त्रार्थ में कोई...

कोरोना तो बेक़सूर है-2

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कोरोना तो बेक़सूर है फैलाओगे तो फैलने को मजबूर है कोरोना तो बेक़सूर है परिवहन इसका इंसान है ये तुम्हारी गलियों से अनजान है तेरे फ़ौलादी जिस्म में खौफ है ऐ-बन्दे फिर क्यों बे-होश है ! तू कैद बंद दीवारों में है कठपुतली- सा इशारों में है आज खुद तू मुट्ठी में है तू गैरहाज़िर, कुदरत ख़ुशी में है तेरा घमंड चूर-चूर है। कोरोना तो बेक़सूर है। चाँद छू लिया मंगल भी पास है पर धरती माँ का मंगल बेआस है तेरे दखलनामे से बीमार होती है बिन तेरे खुद को वो संवार लेती है 'गंगे नमामि' सम्पूर्ण हो गया यमुना से तेरा मैल धू-गया कल-कल बहता निर्मल पानी है ये सब तेरे लालच की कहानी है पूत कपूत कहावत मशहूर है। कोरोना तो बेक़सूर है। मायानगरीयों में मोर नाच रहे हैं कहीं कस्तूरी पोस्टर बांच रहे हैं हिरणी फुदक रही तेरे ज़ेबरा पर शेर-हाथी अब शहर नाप रहे हैं सियार बगल में रहने को सोच रहे हैं वानर पूल में नहाने को लोच रहे हैं कछुए तेरे 'बीच' पे घौंसले बना रहे हैं सब पशु-पंछी पिकनिक मना रहे हैं मानव तुझसे हुई कोई भूल है! कोरोना तो बेक़सूर है। काला आसमान नीला-साफ हु...

कोरोना तो बेक़सूर है-1

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कोरोना तो बेक़सूर है बना या बनाया गया है ! भागा या भगाया गया है ! ना जाने किसने खेल रचाया है !! कहर है कुदरत का या साज़िश है ? जबाव सब मनमाफ़िक हैं साज़िश से हम ना निपट पायेंगे कहर कुदरत का तो मंज़ूर है हां जनाब घर में रहना जी हजूर है कोरोना तो बेक़सूर है। चीन- अमेरिका सब मिले हैं टेड्रोस के होंठ सिले हैं बंद आँखों वाले गले मिले हैं इटली का हाल बेहाल है खुली थीं सरहदें अब पूरा संसार बंदी है स्पेन ब्रिटेन सब जगह मंदी है मासूम जानों का यही सवाल है हमारा क्या कसूर है ? कोरोना तो बेक़सूर है। मेरे वतन के यहां यही सिलसिले हैं हमें तो अपनों से ही गीले हैं मजदूरों की बेबसी- फ्री का  झांसा है ज़मात ने फ़ोकट में मौत को बांटा है किसी ने थूका किसी ने खाँसा है डॉक्टरों को पीटा पुलिस का हाथ काटा है जो जान बचा रहे उन्हीं के दुश्मन बन रहे हैं उफ़! इन लोगों का ये दस्तूर है ! कोरोना तो बेक़सूर है। कोरोना ने पहना क्राउन है बा-हुक्म हर गली लॉक डाउन है फुदकते शहरों में सन्नाटा है भूूूखे पेट कोई थाली बजाता है देखो झोंपड़ी में कौन दीया जलाता है ! मौत पर भी व्याप...