धरोहर-1
अगर आप इंटरनेट पर दुनिया की सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी सर्च करोगे तो गूगल आपको बोलोना यूनिवर्सिटी को पेश कर देगा जो की आधुनिक अर्थों में विश्व का सबसे पुराना शिक्षण संस्थान है। लेकिन भारत के समृद्ध इतिहास से अनगिनत धरोहरों को विदेशी और ख़ासकर मुस्लिम आक्रांताओ द्वारा मिटा दिया गया। वजह उनकी ताकत नहीं थी बल्कि हमारे ख़ुद की जागरण की कमी और जयचंदों ने राष्ट्र पर कुठाराघात किया है। आज हम आपसे बात करेंगे तक्षशिला विश्वविद्यालय की जहां पर शिक्षा की मशाल एक संस्थान के रूप में पहली बार संभाली गई। बात उस समय की है जब गुरुकुल और मठों से शिक्षा का विस्तार हो रहा था। कहते हैं कि भरत के सुपुत्र तक्ष ने तक्षशिला नगरी को बसाया था। इसी महान नगरी में 600-700 ईसा पूर्व स्थापित किया गया था एक विश्वविद्यालय जिसे इसी नगरी का नाम दिया गया- तक्षशिला। यह एक सीमाओं से रहित एक विस्तृत क्षेत्र था जहां पर महान शिक्षाविद अपने आश्रम बनाते थे जो की सभी के लिए बिना भेदभाव के लिए खुले रहते थे बशर्ते विद्यार्थी गहन अध्ययन के लिए तत्पर हों। यहां के शिक्षक या आचार्य शिक्षा के मर्म को जानते थे इसलिए वे लाभरहित स्वैछिक रूप से पढ़ाते थे और विद्यार्थियों से किसी प्रकार की कोई मोटी फीस नहीं ली जाती थी। पाठ्यक्रम लचीला था और 60 से अधिक विषयों पर यहां शोध व् शिक्षण होता था। वेदों से लेकर अर्थशास्त्र, आयुर्वेद, शल्यक्रिया,व्याकरण,गणित आदि यहां पढ़ाये जाते थे। बौद्ध ग्रंथों में भी तक्षशिला विश्वविद्यालय की चर्चा होती है जिसे भिक्षुगण महाविहार कहते थे।
इस शिक्षा के मंदिर की उपलब्धियाँ इतनी हैं की यहां उनका वर्णन नहीं हो सकता, इसने भारतवर्ष को बेशक़ीमती रत्न दिए हैं- पंचतंत्र के रचियता विष्णुशर्मा, अर्थशास्त्र और राजनीति के पुरोधा चाणक्य, व्याकरण के महृषि पाणिनी, बैद्यराज जीवक, महान सम्राट चन्द्रगुप्त और ना जाने और भी कितनी विभूतियाँ यहां की उपज हैं । जब सिकंदर यहां आया तो 10 हजार से अधिक शिक्षार्थी यहां खोजरत थे। यह अध्ययन नगरी राजा आम्भि या आम्भिक के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत आती थी। राजा पोरस से ईर्ष्यावश आम्भि ने सिकंदर से संधि की और राजा पोरस के खिलाफ युद्ध में सिकंदर का साथ दिया। लेकिन इस युद्ध में तथकथित विश्वविजेता को घुटनों पर बैठ कर राजा पोरस से जान की भीख मांगनी पड़ी। लेकिन इस युद्ध में गुरुकल अध्ययन पद्द्ति बुरी तरह प्रभावित हुई। इसके बाद अरब और तुर्क के आक्रांताओं ने तक्षशिला के वैभव को लीलना शुरू कर दिया। उनकी इस्लामिक कट्टर मानसिकता ने शिक्षा के बौद्ध मठों और गुरुकुलों को विध्वंस कर दिया। मुहम्मद बिन कासिम के बाद मुहमद गजनवी और फिर मुहम्मद गौरी के कत्लेआल से स्तूप, मंदिर, और बौद्ध मठ खंडहरों में तब्दील हो गए। 7वीं सदी के चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने संस्मरणों में तक्षशिला को उजड़ा हुआ पाकर दुःख प्रकट किया है। 'किसी देश की संस्कृति को मिटाना हो तो शिक्षा पर वार करो'-शायद ये आक्रमणकारी जानते थे। दुनिया को पढ़ाने वाला राष्ट्र आज टॉप की 200 यूनिवर्सिटीज में खुद का नाम दर्ज करवाने के लिए तरस जाता है। ये लेख केवल धरोहर को याद दिलवाने के लिए नहीं लिखा गया कि उसे याद करके हम खुश होते रहें बल्कि इसका मकसद हमारे शिक्षाविदों और सरकार का ध्यान दिलाना है। हम शिक्षा में बहुत पिछड़ गए हैं। हमें प्रचीन धरोहरों और विज्डम को पुनर्जीवित करना होगा।
You doing great work sir
ReplyDeleteथैंक्यू भाई
Deletewell done sir well written
ReplyDeleteThanku ji
DeleteNyc sir g
ReplyDeleteThanku ji
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