भंवर में कश्ती
रास्ते बहुत नापे हैं
मगर मंज़िल अनजानी-सी है
लफ़ाजी मुहब्बत की दरिया में
क़श्ती अपनी बेगानी-सी है

तुफ़ान से बेख़ौफ नाचती
पर सहमी-सी भंवर से क्यों है ?
डूब जायेगी या तर जायेगी
मुद्दतों की यही कहानी-सी है
चप्पु उल्टे पडें या सीधे
इतना हिसाब कहां है अभी
बेहोशी में सफर तय करना
ऐसी आदत कुछ पुरानी-सी है
लाश तो ठिकाने लग जानी है
कुछ संभलता हूं जाग कर
कहीं तड़फता है कचोटता है चित्त
भटकती मधुमक्खी दिवानी-सी है
बार-बार सुनाई कहानी-सी है।
-रामफल
Your presentation is awesome sir
ReplyDeleteThanku veer
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