कोरोना तो बेक़सूर है-2
कोरोना तो बेक़सूर है
फैलाओगे तो फैलने को मजबूर है
कोरोना तो बेक़सूर है
परिवहन इसका इंसान है
ये तुम्हारी गलियों से अनजान है
तेरे फ़ौलादी जिस्म में खौफ है
ऐ-बन्दे फिर क्यों बे-होश है !
तू कैद बंद दीवारों में है
कठपुतली- सा इशारों में है
आज खुद तू मुट्ठी में है
तू गैरहाज़िर, कुदरत ख़ुशी में है
तेरा घमंड चूर-चूर है।
कोरोना तो बेक़सूर है।

चाँद छू लिया मंगल भी पास है
पर धरती माँ का मंगल बेआस है
तेरे दखलनामे से बीमार होती है
बिन तेरे खुद को वो संवार लेती है
'गंगे नमामि' सम्पूर्ण हो गया
यमुना से तेरा मैल धू-गया
कल-कल बहता निर्मल पानी है
ये सब तेरे लालच की कहानी है
पूत कपूत कहावत मशहूर है।
कोरोना तो बेक़सूर है।
मायानगरीयों में मोर नाच रहे हैं
कहीं कस्तूरी पोस्टर बांच रहे हैं
हिरणी फुदक रही तेरे ज़ेबरा पर
शेर-हाथी अब शहर नाप रहे हैं
सियार बगल में रहने को सोच रहे हैं
वानर पूल में नहाने को लोच रहे हैं
कछुए तेरे 'बीच' पे घौंसले बना रहे हैं
सब पशु-पंछी पिकनिक मना रहे हैं
मानव तुझसे हुई कोई भूल है!
कोरोना तो बेक़सूर है।

काला आसमान नीला-साफ हुआ है
हिमालय भी कितना पास हुआ है !
बेजुबानों के कतल घट रहे हैं
घाव ओजोन परत के भर रहे हैं
हाथ जोड़ झुकना सीख गए हैं
नए हुनर भी कुछ सीख गए हैं
जो जान बचाये वो हीरो हैं
कुछ छुपे बैठे 'नीरो' हैं
मालूम हुआ क्षणभंगुर तेरा नूर है।
कोरोना तो बेक़सूर है।
-रामफल
फैलाओगे तो फैलने को मजबूर है
कोरोना तो बेक़सूर है
परिवहन इसका इंसान है
ये तुम्हारी गलियों से अनजान है
तेरे फ़ौलादी जिस्म में खौफ है
ऐ-बन्दे फिर क्यों बे-होश है !
तू कैद बंद दीवारों में है
कठपुतली- सा इशारों में है
आज खुद तू मुट्ठी में है
तू गैरहाज़िर, कुदरत ख़ुशी में है
तेरा घमंड चूर-चूर है।
कोरोना तो बेक़सूर है।

चाँद छू लिया मंगल भी पास है
पर धरती माँ का मंगल बेआस है
तेरे दखलनामे से बीमार होती है
बिन तेरे खुद को वो संवार लेती है
'गंगे नमामि' सम्पूर्ण हो गया
यमुना से तेरा मैल धू-गया
कल-कल बहता निर्मल पानी है
ये सब तेरे लालच की कहानी है
पूत कपूत कहावत मशहूर है।
कोरोना तो बेक़सूर है।
मायानगरीयों में मोर नाच रहे हैं
कहीं कस्तूरी पोस्टर बांच रहे हैं
हिरणी फुदक रही तेरे ज़ेबरा पर
शेर-हाथी अब शहर नाप रहे हैं
सियार बगल में रहने को सोच रहे हैं
वानर पूल में नहाने को लोच रहे हैं
कछुए तेरे 'बीच' पे घौंसले बना रहे हैं
सब पशु-पंछी पिकनिक मना रहे हैं
मानव तुझसे हुई कोई भूल है!
कोरोना तो बेक़सूर है।

काला आसमान नीला-साफ हुआ है
हिमालय भी कितना पास हुआ है !
बेजुबानों के कतल घट रहे हैं
घाव ओजोन परत के भर रहे हैं
हाथ जोड़ झुकना सीख गए हैं
नए हुनर भी कुछ सीख गए हैं
जो जान बचाये वो हीरो हैं
कुछ छुपे बैठे 'नीरो' हैं
मालूम हुआ क्षणभंगुर तेरा नूर है।
कोरोना तो बेक़सूर है।
-रामफल
dharti ka sabse bda dushman insan hai
ReplyDeleteIndeed
DeleteNice one
ReplyDeleteThanks ji
Delete