छलक रही मेरी तरुणाई
हम त्राहि -त्राहि मचा दें
अगर तू कहे
हम धरा को स्वर्ग बना दें
अगर तू कहे
तेरे पास है पूरा मौका
हमसे काम लेने का
क्योंकि छलक रही है तरुणाई
जोश नया उमंग नई
फड़कती भुजाएं
कुछ करना चाहें
भीतर बैठा ज्वालामुखी
विद्रोही है प्रवृत्ति
शेर की दहाड़
मांगती ललकार
लोहा लेने को तैयार है
इशारे की दरकरार है
अभी मौका है
अरे नरेश ! क्यों सोता है ?
वक़्त न निकाल हाथ से
मर रहे हम प्यास से
तू हमें खोल दे
हिम्मत से बोल दे
रस्ते हम बना लेंगें
सेज़ कांटों की सजा लेंगें
जवान देश भटक न जाए
ख़ुद बना फंदा लटक न जाए
कलम ध्यान से चला
उलझी गांठें दे सुलझा
वक़्त हाथ से जाने न दे
झूठे बहाने बनाने न दे
सड़ी-गली आदिम कालीन
का रेड-कॉरपेट बिछा
हमें चलने दे
आरक्षण क्यों भक्षण करे
उड़ते बाज़ का !
इससे पहले की
पंख टूटें
नजर करे धोखा
रक्त हो स्थिल
चील नोचें मांस
बनी मेरी लाश का !
तू लेकर मेरी तरुणाई
जागरण करले
धरा-आकाश मिलन और मेरी शहनाई
बस मङ्गलाचरण करले
आएगी फिर नयी पीढ़ी
निष्प्राण
चाहे उलटा लटका
पीठ थप -थपा
कुदरत से सीख
नवजीवन-नवप्राण भर ले
मस्तक पे तिलक लगा
नारियल तोड़ शुभारम्भ कर
बैठा रहा नहीं जाता
अरे नरेश ! क्या दे रहा है सुनाई
अभी छलक रही मेरी तरुणाई।
Nycc lines sir
ReplyDeletethanku ji
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